लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के धौरहरा क्षेत्र में स्थित कफारा शिव मंदिर, जिसे लीलानाथ शिव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके पीछे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं भी इसे एक अद्वितीय पहचान देती हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कफारा का प्राचीन नाम विक्रम बाजार था। ऐसा माना जाता है कि यह स्थल आल्हा-ऊदल के युग का है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, वीर योद्धा आल्हा ने गांजर की लड़ाई आरंभ करने से पूर्व यहाँ भगवान शिव का पूजन करते हुए शिवलिंग की स्थापना की थी। उन्होंने शिव से माड़व विजय की कामना की और इस स्थल को तीर्थ का दर्जा प्राप्त हुआ।
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बंजारों की कथा और चमत्कार
समय बीतने के साथ, यह स्थान साधारण प्रतीत होने लगा। एक समय, बंजारों का एक समूह इस क्षेत्र में रुका और अज्ञानवश शिवलिंग को एक साधारण पत्थर समझकर उस पर मूज कूटने लगा। तभी एक अद्भुत घटना घटी—शिवलिंग से रक्त की धारा बह निकली। यह दृश्य देखकर बंजारे भयभीत होकर भाग गए।
महारानी सुरथ कुमारी शाह का योगदान
यह चमत्कारी घटना जब खैरीगढ़ स्टेट की महारानी सुरथ कुमारी शाह को पता चली, तो उन्होंने इसे भगवान शिव का चिह्न मानते हुए वहाँ प्रायश्चित स्वरूप एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण करवाया। इस धार्मिक भावना और पश्चाताप को उर्दू में “कफारा” कहा जाता है। इसी कारण, इस स्थल का नाम विक्रम बाजार से बदलकर कफारा पड़ गया।
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धार्मिक महत्त्व और वार्षिक मेला
कफारा शिव मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। विशेष रूप से बैसाखी पर्व के अवसर पर यहाँ सात दिन तक चलने वाला भव्य मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से भक्तगण शामिल होते हैं। इस मेले में धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन, झूले, मेलाघूमी, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक रहती है।
कैसे पहुँचें
कफारा मंदिर लखीमपुर खीरी जिले के धौरहरा क्षेत्र में स्थित है। यहाँ सड़क और रेल दोनों मार्गों से आसानी से पहुँचा जा सकता है। लखीमपुर और सीतापुर से यहाँ के लिए नियमित वाहन उपलब्ध हैं।
कफारा शिव मंदिर न केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह इतिहास, आस्था और चमत्कार का संगम भी है। इसकी ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक महत्त्व इसे उत्तर भारत के प्रमुख शिव मंदिरों में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं।
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